श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम अध्याय


श्रीमद्भगवद्गीता
प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग)
छठा श्लोक:
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥ ६ ॥

पदच्छेद एवं अर्थ:
युधामन्युः च विक्रान्तः – पराक्रमी युधामन्यु
उत्तमौजाः च वीर्यवान् – शक्तिमान उत्तमौजा
सौभद्रः – सुभद्रा का पुत्र (अभिमन्यु)
द्रौपदेयाः च – द्रौपदी के पाँचों पुत्र (प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानिक और श्रुतसेन)
सर्व एव महारथाः – ये सभी महान महारथी हैं।

भावार्थ:
दुर्योधन अपने गुरु द्रोणाचार्य को पांडव सेना के प्रमुख शूरवीरों के नाम बताते हुए कहता है कि पराक्रमी युधामन्यु, अत्यंत शक्तिशाली उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु तथा द्रौपदी के पाँचों पुत्र—ये सभी महारथी (एक साथ दस हजार धनुर्धारियों से लड़ने में सक्षम योद्धा) हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) के श्लोक 7, 8, 9 और 10 में दुर्योधन अपनी स्वयं की (कौरव) सेना के प्रमुख योद्धाओं का वर्णन गुरु द्रोणाचार्य से कर रहा है।
श्लोक 7
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥ ७ ॥
शब्दार्थ: अस्माकम् (हमारी) | तु (भी) | विशिष्टाः (प्रधान) | ये (जो) | तान् (उन्हें) | निबोध (समझ लीजिए/सुन लीजिए) | द्विजोत्तम (हे ब्राह्मणश्रेष्ठ!) | नायकाः (सेनापति/नायक) | मम (मेरी) | सैन्यस्य (सेना के) | संज्ञार्थम् (आपकी जानकारी के लिए) | तान् (उन्हें) | ब्रवीमि (बताता हूँ) | ते (आपको)।
भावार्थ: दुर्योधन कहता है—"हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! हमारी सेना में भी जो मुख्य-मुख्य योद्धा हैं, आपकी जानकारी के लिए मैं उनके नाम भी आपको बताता हूँ।"
श्लोक 8
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥ ८ ॥
शब्दार्थ: भवान् (आप - द्रोणाचार्य) | भीष्मः (पितामह भीष्म) | च (और) | कर्णः (कर्ण) | च (और) | कृपः (कृपाचार्य) | समितिंजयः (सदा संग्राम विजय होने वाले) | अश्वत्थामा (अश्वत्थामा) | विकर्णः (विकर्ण) | सौमदत्तिः (सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा) | तथा एव च (तथा वैसे ही)।
भावार्थ: "आप (द्रोणाचार्य), पितामह भीष्म, कर्ण और युद्धविजयी कृपाचार्य; तथा अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा—ये सभी सर्वदा विजय प्राप्त करने वाले योद्धा हैं।"
श्लोक 9
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥ ९ ॥
शब्दार्थ: अन्ये (दूसरे) | च (और) | बहवः (अनेक) | शूराः (वीर योद्धा) | मदर्थे (मेरे लिए) | त्यक्तजीविताः (जीवन त्यागने को तैयार) | नाना (अनेक प्रकार के) | शस्त्र (अस्त्र-शस्त्र चलाने में) | प्रहरणाः (प्रहार करने वाले) | सर्वे (सभी) | युद्धविशारदाः (युद्ध कला में चतुर)।
भावार्थ: "इनके अलावा भी मेरे लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले अनेक शूरवीर योद्धा हैं, जो तरह-तरह के शस्त्रों से लैस हैं और युद्ध विद्या में अत्यंत निपुण हैं।"
श्लोक 10
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥ १० ॥
शब्दार्थ: अपर्याप्तम् (असीमित/अथाह) | तत् (वह) | अस्माकम् (हमारी) | बलम् (सैन्य शक्ति) | भीष्म-अभिरक्षितम् (भीष्म द्वारा रक्षित) | पर्याप्तम् (सीमित/पर्याप्त) | तु (लेकिन) | इदम् (यह) | एतेषाम् (इन पांडवों की) | बलम् (सैन्य शक्ति) | भीम-अभिरक्षितम् (भीम द्वारा रक्षित)।
भावार्थ: "भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना हर प्रकार से असीमित और अजेय है, जबकि भीम द्वारा रक्षित इन पांडवों की सेना अत्यंत सीमित है।"
संदर्भ (Context)
महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध की शुरुआत से ठीक पहले दोनों ओर की सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं। पांडव पक्ष की विशाल और व्यूहरचित सेना को देखकर कौरव राजा दुर्योधन अत्यंत भयभीत और आशंकित हो जाता है।
अपने इस भय को छिपाने और स्वयं को आश्वस्त करने के लिए वह अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाता है। श्लोक 1 से 6 तक पांडव सेना के महारथियों की गिनती करवाने के बाद, श्लोक 7 से 10 के बीच दुर्योधन अपनी स्वयं की सेना का मनोबल बढ़ाने और गुरु द्रोणाचार्य को युद्ध के लिए प्रेरित करने का प्रयास कर रहा है:
कूटनीतिक भय और चापलूसी (श्लोक 7-8): दुर्योधन द्रोणाचार्य को 'द्विजोत्तम' कहकर संबोधित करता है ताकि उनका सम्मान बना रहे, फिर वह अपनी सेना के उन प्रमुख योद्धाओं (जैसे स्वयं द्रोणाचार्य, भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य) का स्मरण कराता है जो कभी पराजित नहीं हुए।
अहंकार और अति-विश्वास (श्लोक 9): दुर्योधन दावा करता है कि दुनिया भर के प्रतापी राजा उसके लिए अपने प्राण न्योछावर करने को तैयार हैं, जिससे उसका आंतरिक भय झिझकता हुआ प्रकट होता है।
तुलना और मानसिक अस्थिरता (श्लोक 10): वह अपनी सेना की तुलना पांडवों की सेना से करता है। उसे लगता है कि पितामह भीष्म के संरक्षण में उसकी सेना अजेय है, जबकि पांडवों की सेना भीम की देखरेख में सीमित है।
संक्षेप में, इन श्लोकों का मुख्य संदर्भ दुर्योधन का मानसिक तनाव, अपनी सेना का आकलन और युद्ध प्रारंभ होने से ठीक पहले गुरु द्रोणाचार्य को अपनी ओर पूरी निष्ठा से युद्ध करने के लिए मनाना है।
संदर्भ (Context):
श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) के श्लोक 9 से 15 तक का संदर्भ कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि से है। यहाँ संजय राजा धृतराष्ट्र को युद्ध की तैयारी और दोनों सेनाओं की स्थिति का हाल बता रहे हैं। श्लोक 9 से 11 में दुर्योधन अपनी विशाल सेना और महान योद्धाओं की प्रशंसा करता है, जबकि श्लोक 12 से 15 में कौरव और पाण्डव पक्ष के वीरों द्वारा युद्ध का शंखनाद करने का वर्णन है।
श्लोक 9
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशास्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥
अर्थ: (दुर्योधन द्रोणाचार्य से कहता है) इनके अलावा भी बहुत से शूरवीर योद्धा हैं, जो मेरे लिए अपना जीवन त्यागने को तैयार हैं। वे सभी अनेक प्रकार के शस्त्र-अस्त्रों से सुसज्जित हैं और युद्धकला में अत्यंत निपुण हैं।
श्लोक 10
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥
अर्थ: भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय (असीम) है, और भीम द्वारा रक्षित इन पांडवों की यह सेना जीतने में सुगम (सीमित) है।
श्लोक 11
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥
अर्थ: इसलिए आप सब लोग अपने-अपने मोर्चों पर अपनी जगह दृढ़ता से स्थित रहते हुए सब ओर से केवल पितामह भीष्म की ही रक्षा करें।
श्लोक 12
तस्य सञ्जनयन् हर्षणं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥
अर्थ: कौरवों में वयोवृद्ध और अत्यंत प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए सिंह की गर्जना के समान उच्च स्वर से अपना शंख बजाया।
श्लोक 13
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥
अर्थ: इसके बाद शंख, नगारे, ढोल, मृदंग और नरसिंगे आदि वाद्ययंत्र एक साथ बज उठे। उनका वह भयानक शब्द संपूर्ण आकाश में गूंज उठा।
श्लोक 14
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः॥
अर्थ: इसके पश्चात सफेद घोड़ों से युक्त अत्यंत श्रेष्ठ रथ में बैठे हुए भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अपने-अपने दिव्य शंखों को बजाया।
श्लोक 15
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः॥
अर्थ: श्रीकृष्ण महाराज ने 'पांचजन्य' नामक, अर्जुन ने 'देवदत्त' नामक और भयानक कर्म करने वाले भीमसेन ने 'पौण्ड्र' नामक महाशंख बजाया।

श्लोक 21 एवं 22
अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ २१ ॥
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥
भावार्थ: अर्जुन बोले— हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए, जब तक कि मैं युद्ध की इच्छा से खड़े हुए इन विपक्षियों को भली-भांति देख न लूं कि इस युद्ध रूपी व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है।
श्लोक 23
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥
भावार्थ: दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा वाले जो-जो यह राजा लोग इस सेना में आये हैं, युद्ध करने वाले उन सब को मैं देख लूं।
श्लोक 24 एवं 25
संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरुनिति ॥ २५ ॥
भावार्थ: संजय बोले— हे धृतराष्ट्र! अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भगवान श्री कृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा करके इस प्रकार कहा— "हे पार्थ! युद्ध के लिए एकत्र हुए इन कौरवों को देखो।"
श्लोक 26
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥ २६ ॥
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
भावार्थ: इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित पितरों को, पितामहों को, आचार्यों को, माताओं के भाइयों (मामाओं) को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को, श्वशुरों को और सुहृदों को भी देखा।
श्लोक 27
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ।
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ॥ २७ ॥
भावार्थ: उन उपस्थित सभी बंधु-बांधवों को देखकर वे कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यंत करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए इस प्रकार बोले।
श्लोक 28
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥ २८ ॥
भावार्थ: अर्जुन बोले— हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा वाले इस अपने ही स्वजन-समुदाय को सामने उपस्थित देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मेरा मुख सूखा जा रहा है।
श्लोक 29
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ।
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ॥ २९ ॥
भावार्थ: मेरे शरीर में कम्प और रोमहर्ष (रोंगटे खड़े होना) हो रहा है; हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है।
श्लोक 30
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ॥ ३० ॥
भावार्थ: हे केशव! मेरा मन भ्रमित सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ हूं और मैं लक्षणों (शकुनों) को भी विपरीत ही देख रहा हूं।
श्रीमद्भागवत गीता के **प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) के श्लोक 31 से 40** तक, अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से युद्ध के परिणाम में होने वाले भयंकर दुष्प्रभावों और पारिवारिक नाश के परिणामों का वर्णन कर रहे हैं।
### श्लोक 31: कुल के नाश के दोष देखना
> **न च पश्यामि श्लाध्यानि हत्वा स्वजनमाहवे।**
> **न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च॥ 31॥**
> 
**अर्थ:** हे कृष्ण! युद्ध में अपने ही स्वजनों (कुटुंबियों) को मारकर मैं किसी भी प्रकार के कल्याण को नहीं देखता। और न ही मैं विजय, राज्य या सुख की कामना करता हूँ।
### श्लोक 32 से 35: राज्य और सुख की निरर्थकता
> **किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा।**
> **येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च॥ 32॥**
> **त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्ता धनानि च।**
> **आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः॥ 33॥**
> **मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा।**
> **एतान्तुम् इच्छामि हतोऽपि मधुसूदन॥ 34॥**
> **अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु कृते कृते।**
> **निहत्य धार्तराष्ट्रान्कानः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन॥ 35॥**
> 
**अर्थ:** हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से, भोगों से या जीवन से भी क्या लाभ, जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते हैं—वे ही सब आचार्य, पिता, पुत्र, दादा, मामा, ससुर, पोते, साले और अन्य संबंधी अपने प्राणों और धन की बाजी लगाकर इस युद्ध में खड़े हैं। हे मधुसूदन! यदि ये मुझे मार भी दें, तब भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता; भले ही मुझे तीनों लोकों का राज्य मिल जाए, पृथ्वी तो बहुत छोटी चीज़ है। धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन्हें मारने से तो हमें पाप ही लगेगा।
### श्लोक 36: आताताइयों के वध पर विचार
> **पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः।**
> **तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।**
> **स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥ 36॥**
> 
**अर्थ:** इन आताताइयों (अपराधियों या हमलावरों) को मारने से हम पर पाप ही चढ़ेगा। इसलिए अपने ही रिश्तेदारों—धृतराष्ट्र के पुत्रों—को मारना हमारे लिए उचित नहीं है। हे माधव! अपने ही स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं?
### श्लोक 37 से 38: कुलक्षय (वंश के नाश) के पाप का भय
> **यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।**
> **कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥ 37॥**
> **कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मात्निवर्तितुम्।**
> **कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥ 38॥**
> 
**अर्थ:** यद्यपि लोभ के कारण भ्रष्ट हुई बुद्धि वाले ये लोग कुल के नाश से होने वाले दोष और मित्रों से द्रोह करने के पाप को नहीं देखते, फिर भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न होने वाले इस पाप को स्पष्ट जानने वाले हम लोग इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करें?
### श्लोक 39 से 40: कुलधर्म का नाश और उसके दुष्परिणाम
> **कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मः सनातनाः।**
> **धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥ 39॥**
> **अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।**
> **स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥ 40॥**
> 
**अर्थ:** कुल के नाश से कुल के सनातन (प्राचीन) धर्म नष्ट हो जाते हैं और धर्म के नष्ट हो जाने पर संपूर्ण कुल में पाप (अधर्म) फैल जाता है। हे कृष्ण! अधर्म के बहुत बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय (कृष्ण)! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर (अवांछित संतानें) उत्पन्न होते हैं।
गीता प्रथम अध्याय श्लोक 41
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥ ४१ ॥

अर्थ: हे कृष्ण! अधर्म के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित (कलंकित) हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर (अवांछित तथा अयोग्य) संतान उत्पन्न होती है।

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥ ४२ ॥
अर्थ
वर्णसंकर संतान कुलघातियों को और पूरे कुल को नरक में ले जाने का कारण ही बनती है। तथा श्राद्ध (पिंडदान) और तर्पण (जलदान) की क्रियाएं रुक जाने के कारण इनके पितृगण भी स्वर्ग/उच्च लोकों से पतित हो जाते हैं।"

* श्रीमद्भगवद्गीता *

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ ४६ ॥

शस्त्र लिये धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधनादि रण में निरस्त्र मुझे मारें तो भी मेरा बहुत ही कुशल हो ॥ ४६॥

सञ्जय उवाच

एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ।॥४७ ।।

संजय कहते हैं रणभूमि में अर्जुन ऐसा कह धनुष-बाण फेंक शोकग्रसित मनवाले हो रथ के पीछे जा बैठे ॥४७॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥

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