Srimadbhagwadgeeta part 2
श्रीमद्भगवद्गीता के **द्वितीय अध्याय (सांख्य योग)** के प्रथम 5 श्लोक महाभारत के युद्धभूमि पर अर्जुन के विषाद, व्याकुलता और श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए प्रथम उपदेश से संबंधित हैं:
### श्लोक 1
**सञ्जय उवाच**
**तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।**
**विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥**
* **भावार्थ:** सञ्जय ने कहा—उस प्रकार करुणा से व्याप्त, आँसुओं से भरे हुए तथा व्याकुल नेत्रों वाले, शोकयुक्त अर्जुन से मधुसूदन (भगवान श्रीकृष्ण) ने यह वचन कहा।
### श्लोक 2
**श्रीभगवानुवाच**
**कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।**
**अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥**
* **भावार्थ:** श्रीभगवान् ने कहा—हे अर्जुन! इस विषम अवसर पर तुम्हें यह मोह (कायरता) कहाँ से प्राप्त हुआ? यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित नहीं है, न तो स्वर्ग को देने वाला है और न ही यश प्रदान करने वाला है।
### श्लोक 3
**क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।**
**क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥**
* **भावार्थ:** हे पार्थ! कायरता (नपुंसकता) को प्राप्त मत हो, यह तुम्हारे योग्य नहीं है। हे शत्रुओं को तपाने वाले अर्जुन! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।
### श्लोक 4
**अर्जुन उवाच**
**कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।**
**इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥**
* **भावार्थ:** अर्जुन ने कहा—हे मधुसूदन! हे अरिसूदन (शत्रुहंता)! मैं युद्धभूमि में बाणों से पूजनीय भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध कैसे लडूंगा? वे दोनों मेरे द्वारा पूजा करने योग्य हैं।
### श्लोक 5
**गुरूनहत्वा हि महानुभावान्**
**श्रेयो भोक्तूं भैक्ष्यमपीह लोके।**
**हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव**
**भुञ्जीय भोगान रुधिरप्रदिग्धान्॥**
* **भावार्थ:** ऐसे महानुभाव गुरुजनों को न मारकर इस लोक में भीख माँगकर खाना भी कल्याणकारी (श्रेष्ठ) है; क्योंकि गुरुजनों को मारकर इस संसार में धन और काम-रूपी जितने भी भोग हम भोगेंगे, वे सब रक्त से सने हुए ही तो होंगे।
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